हम बरनवाल कब सीखेंगे? बिहार चुनाव और बरनवाल समाज - मनोज कुमार प्रियदर्शी, जर्नलिस्ट

 हम बरनवाल कब सीखेंगे? 

* बरनवाल ही बरनवालों का बरनवालद्रोही है! बुरा लगेगा, लेकिन यही सच्चाई है। अपवाद छोड़ दिया जाए तो किसी भी बरनवाल को कभी भी आगे बढ़ने में न मदद करते हैं और न ही बढ़ता देख सकते हैं। 

* अग्रवाल समाज को देखिए। किसी अपने की तरक्की में अपनी सफलता मानते हैं और हर संभव मदद करते हैं। इसलिए अग्रवालों की पूछ-परख सभी बड़े राजनीतिक दल करते हैं और उनके हर स्थानीय और राष्ट्रीय आयोजनों में बड़े - बड़े, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री तक जाते हैं।

*  हमारे समाज के बहुसंख्यक लोग आज बहुत खुश हैं कि बिहार में एनडीए गठबंधन जीत गया। अच्छी बात है, खुश रहें, लेकिन यह भी सोचें कि आप कब तक इन दलों की भीड़ का सिर्फ हिस्सा रहेंगे? अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व कब होगा?

* नवादा से खड़े हमारे बरनवाल समाज के प्रत्याशी जितेंद्र प्रताप जी (जीतू जी) को क्यों जिताने में मदद नहीं की? याद रखिए, बिना राजनीतिक ताकत हासिल किए कुछ नहीं कर सकते। अगर हमारे समाज का एक भी व्यक्ति विधायक या मंत्री बनता तो उनसे हमें जितनी मदद मिलती, वह कभी भी कोई भी दल के व्यक्ति से नहीं मिल सकती। इसलिए सोच बदलने की जरूरत है।

* अपने समाज के कुछ लोग कह रहे हैं कि जीतू जी जीतते तो सनातन हार जाता? वाकई ऐसा होता? क्या बरनवाल हिंदू नहीं हैं? क्या जीतू जी हिन्दू नहीं हैं? भले ही जीतू जी निर्दलीय लड़े, लेकिन वह हमारे समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं जानता, लेकिन बरनवाल होने के नाते मैं उनके समर्थन में यह सब लिख रहा हूं। 

- मनोज कुमार प्रियदर्शी, 
जर्नलिस्ट


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सामूहिक वैश्य देव पूजन, पटना

सामूहिक वैश्य देव पूजन- Patna City

झारखंड प्रदेश ने चुना श्रीमती वीणा बरनवाल (रांची) को महिला अध्यक्ष