बरनवाल समाज का बिहार चुनाव में हाल - गलती किसकी....गलत कौन......यह चिंतन का विषय

 छोटी-बड़ी बहुत सारी चुनाव के परिणाम के बाद कि मन:स्थिति को नजदीक से महसूस किया।

 अपने समाज के नेताजी की एक खासियत:- चुनाव जीत गये तो उसका श्रेय स्वजातीय बंधुओं (समाज) को नहीं देते लेकिन चुनाव हार जाते हैं तो वे यह कहते दिखाई देते हैं कि समाज के लोगों ने सपोर्ट ही नहीं किया!


 आप सभी ऐसे शब्दों से,ऐसे लफ़्ज़ों को सुन चुके होंगे।

 गुप्त मतदान की चुनावी प्रक्रिया में एक नेता का ऐसा दावा क्या विश्वसनीय है❓

 एक उदाहरण से इसे समझना चाहिए --

किसी क्षेत्र में कुल मतदाता एक लाख है जिसमें बरनवाल मतदाताओं की संख्या बीस हजार।

किसी बरनवाल नेता को कुल बत्तीस हजार मत प्राप्त हुए और वह हार जाता है।

 नेताजी,अपनी हार का ठीकरा कैसे और कहां फोड़ते हैं, ये देखिए.... मुझे अपने स्वजातीय बंधुओं का सहयोग नहीं मिला, इसलिए मैं हार गया ।

 बतलाइए कि नेताजी का यह कहना उचित है क्या कि समाज के लोगों ने उन्हें सपोर्ट ही नहीं किया ❓

 जो वोट उन्हें मिली, क्या वे सारे के सारे गैर जातीय वोट ही थे.... इस दावे का आधार क्या❓ सभी मतदाताओं के द्वारा की गयी व्यक्तिगत मतदान की वीडियो रिकॉर्डिंग नेताजी को उपलब्ध हुई क्या ❓

 मतदाता दृष्टिकोण:- 

  ऐसी घटिया लफ्ज़ और सोच को देखकर जिन स्वजातीय बंधुओं ने मत देकर सपोर्ट भी किया होगा क्या ऐसे लोग भविष्य में सपोर्ट करेंगे ❓ क्या अन्य जाति के लोग अपने स्वजातीय वोट बैंक की अवहेलना करते दिखाई देते हैं क्या ❓

 राजनैतिक दृष्टिकोण:- चुनाव लड़ने  वाले नेताजी सालों भर अपने स्वजातीय कार्यक्रमों में मंचासीन दिखाई देते हैं और जब ऐसे नेताजी चुनाव हारने के बाद यह कहते दिखाई देते हैं कि समाज के लोगों ने सपोर्ट नहीं किया तो राजनैतिक दलों के बीच यह सन्देश जाता है कि जिसको सालों भर समाज के लोग सम्मान देते हैं उसे समाज चुनाव में सपोर्ट नहीं करता तो ऐसे समाज के नेता को टिकट क्यों दिया जाये!

 नामिनेशन के पुर्व नेताजी के द्वारा समाज के लोगों के बीच बैठक रखकर अपने चुनावी उद्देश्य की जानकारी दी गई❓ सहयोग  मांगा गया❓❓

 गलती किसकी....गलत कौन......यह चिंतन का विषय

शिवराम निशान्त ✒

 ईसरी बाजार

राष्ट्रीय अध्यक्ष 

श्री भारतवर्षीय बरनवाल युवक संघ

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