भारत के लोकतंत्र को झकझोर देने वाला एक नागरिक- अनूप बरनवाल

 भारत के लोकतंत्र को झकझोर देने वाला एक नागरिक- अनूप बरनवाल

अनूप बरनवाल का नाम मार्च 2023 में तब राष्ट्रीय चर्चा में आया, जब उनकी दाख़िल एक याचिका ने भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर देशव्यापी बहस खड़ी कर दी। यह मामला सिर्फ़ एक कानूनी तकनीकी मुद्दा नहीं था, बल्कि लोकतंत्र के उस मूल प्रश्न से जुड़ा था कि क्या चुनाव आयोग वास्तव में स्वतंत्र है, जब उसके शीर्ष पदों पर नियुक्ति करने की पूरी शक्ति कार्यपालिका के पास रहती है।

उनकी याचिका ने संविधान के अनुच्छेद 324(2) में मौजूद उस खालीपन की ओर इशारा किया, जहाँ कहा तो गया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक कानून द्वारा तय होगी, लेकिन स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी वह कानून कभी बनाया ही नहीं गया। इस कानूनी शून्य का परिणाम यह था कि प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के चुनाव आयुक्त नियुक्त कर देते थे। यही स्थिति चुनाव आयोग की निष्पक्षता के लिए सबसे बड़ा खतरा थी।

अनूप बरनवाल ने एक सामान्य नागरिक होते हुए भी वह सवाल उठाया, जिसे उठाने की हिम्मत बड़े-बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विशेषज्ञ भी नहीं दिखाते। उन्होंने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग जैसी संस्था का पूरी तरह कार्यपालिका पर निर्भर रहना चुनावों की निष्पक्षता के साथ समझौता है। उनकी याचिका ने सुप्रीम कोर्ट को मजबूर किया कि वह इस मुद्दे पर ऐतिहासिक निर्णय दे।

मार्च 2023 में पाँच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक संसद कानून न बनाए, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक विशेष चयन समिति द्वारा की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। यह फैसला एक तरह से कार्यपालिका के एकाधिकार को असंवैधानिक ठहराता था और चुनाव आयोग को अधिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता था। यह अनूप बरनवाल की एकल याचिका से संभव हुआ-किसी संगठन या राजनीतिक पार्टी की वजह से नहीं।

बाद में संसद ने 2023 का नया कानून पारित किया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। इस विधायी बदलाव ने फिर से बहस खड़ी कर दी कि क्या कार्यपालिका का प्रभाव लौट आया है। लेकिन चाहे कानून में बाद में जो भी संशोधन हुए हों, यह सच नहीं बदलता कि पूरी बहस की नींव अनूप बरनवाल ने रखी।

अनूप बरनवाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र सिर्फ़ चुनाव से नहीं चलता, बल्कि उन नागरिकों से चलता है जो व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाने का साहस रखते हैं। उन्होंने न्यायपालिका और संसद दोनों को संवैधानिक जिम्मेदारी याद दिलाई और दिखाया कि एक आम व्यक्ति भी देश के लोकतंत्र की दिशा बदलने का कारण बन सकता है।

आज उनके नाम पर केवल एक केस नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक विमर्श खड़ा है- जो आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाएगा कि कभी एक नागरिक ने अकेले ही चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की लड़ाई छेड़ दी थी।

बरनवाल डायरेक्ट्री

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सामूहिक वैश्य देव पूजन, पटना

सामूहिक वैश्य देव पूजन- Patna City

झारखंड प्रदेश ने चुना श्रीमती वीणा बरनवाल (रांची) को महिला अध्यक्ष