औरत और मर्द की जुगलबंदी “बहस बराबरी की ”
जुगलबंदी “बहस बराबरी की ”
पुरुष
सुबह से शाम कमाता हूँ, तब घर का चूल्हा जलता है।
इतनी मेहनत के बाद भी, तुम्हें मुझसे क्या खलता है।।
महिला
चूल्हा जलता होगा लेकिन, घर अपने आप नहीं चलता।
कपड़ा, बर्तन, बच्चे, रिश्ते, इनमें भी दिन पूरा ढलता।।
पुरुष
अरे, तुम तो घर में रहती हो, इतना क्या थक जाती हो।
दो रोटी ही तो बनानी है, बात बात पर चिल्लाती हो।।
महिला
वाह रे मालिक सोच तुम्हारी, घर को होटल समझ लिया।
एक दिन खुद करके देखो, पता चलेगा क्या क्या किया।।
पुरुष
अब तो तुम भी नौकरी कर लो, यही रोज सुनता रहता हूँ।
घर आकर भी ऑफिस जैसा, तनाव मैं ही सहता हूँ।।
महिला
क्यों ना करूँ मैं नौकरी, क्या सपने सिर्फ तुम्हारे हैं।
तुम बाहर जाकर आदमी हो, हम घर में बेकार बेचारे हैं।।
पुरुष
मैंने कब तुमको रोका है, बस घर थोड़ा संभल जाए।
बच्चे, माँ बाप, रिश्तेदारी, सबका ध्यान भी रह जाए।।
महिला
घर मेरा ही जिम्मा क्यों हो, तुम भी तो घर वाले हो।
बच्चे केवल मेरे नहीं, उनके तुम भी पाले हो।।
पुरुष
ऑफिस से थक हार के आता, फिर भी चैन नहीं मिलता।
तुम्हारा रोज का लेक्चर भी, ऊपर से अलग ही चलता।।
महिला
और हमारा क्या साहब, हम क्या फूलों पर सोते हैं।
तुम टीवी लेकर बैठ जाते, हम रसोई में रोते हैं।।
पुरुष
पहले की औरतें अच्छी थीं, घर को घर ही रखती थीं।
पति की इज्जत सबसे ऊपर, चुपचाप सब सह लेती थीं।
महिला
पहले की औरतें मजबूर थीं, अवसर उनसे छीने थे।
अब पढ़ लिखकर आगे बढ़े, तो तेवर तुम्हें खटके हैं।।
पुरुष
अब हर बात में बराबरी है, थोड़ा डर भी लगता है।
कल को बोलो घर जमाई बन, ये भी दिन क्या आता है।।
महिला
डरना मत, बस समझो इतना, रिश्ता कोई जंग नहीं।
राज तुम्हारा खत्म हुआ है, लेकिन तुम भी तंग नहीं।।
पुरुष
तो आखिर चाहती क्या हो, साफ साफ बतला दो ना।
हर बहस का अंतिम मतलब, आज मुझे समझा दो ना।।
महिला
ना सिंहासन, ना हुकूमत, ना तुमसे आगे जाना है।
बस जितना तुम इंसान हो, उतना ही माना जाना है।।
दोनों
घर तब सुंदर बन पाएगा, जब दोनों सम्मान करें।
एक दूसरे को बदलने नहीं, समझने का प्रयास करें।।
बरनवाल डायरेक्ट्री, जून 2026
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