"तुम्हारे घर वाले मुझसे इतना चिढ़ते क्यों हैं?"

 "तुम्हारे घर वाले मुझसे इतना चिढ़ते क्यों हैं?"

एक दिन मैंने पत्नी सुमन से नाराज होकर पूछा।

सुमन कुछ देर चुप रही, फिर बोली, "पिताजी के जाने के बाद हमारे घर में सिर्फ माँ और हम चार बहनें थीं। घर में जो भी आदमी आया, वह सहारा देने नहीं, कुछ लेने आया। किसी की नजर गहनों पर थी, किसी की जमीन पर और किसी की हमारी मजबूरी पर।”

मैं चुपचाप सुनता रहा।

"मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, परिचित, सबने किसी न किसी तरह फायदा उठाने की कोशिश की। कुछ लोगों ने माँ की दूसरी शादी तक की सलाह दी। लेकिन माँ ने सिर्फ अपनी बेटियों का भविष्य देखा और अकेले संघर्ष करती रहीं।”

फिर उसने मेरी तरफ देखकर कहा, "आप बुरे नहीं हैं, लेकिन हमारे अनुभव अच्छे नहीं रहे। इसलिए भरोसा करने में समय लगता है।”

उस दिन पहली बार मैंने उनकी नजर से खुद को देखा। मैं केवल दामाद नहीं था, एक पुरुष भी था, और उनके जीवन के अनुभवों ने उन्हें पुरुषों से सावधान रहना सिखाया था।

उसके बाद मैंने शिकायत करना छोड़ दिया। मैंने अपनी जगह मांगने के बजाय उसे कमाने की कोशिश की। घर की जरूरतों में चुपचाप हाथ बंटाने लगा। बिना कहे मदद करने लगा।

समय बीतता गया।

एक दिन सासु माँ ने मुस्कुराकर पूछा, "बेटा, चाय पियोगे?"

मैंने चाय का कप लिया और मन ही मन मुस्कुरा दिया।

उस दिन समझ आया कि कुछ घरों में रिश्ते जन्म से नहीं बनते, भरोसे से बनते हैं। और कुछ टूटे हुए घरों में भरोसा जीत लेना ही सबसे बड़ा रिश्ता होता है।

रेणुका बरनवाल, पटना


बरनवाल डायरेक्ट्री, जून 2026

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